Monday, 29 December 2014

आईना देख रही थी

कोई चेहरा हुआ रोशन न उजागर आंखें
आईना देख रही थी मेरी पत्थर आंखें
ले उडी वक़्त की आंधी जिन्हे अपने हमराह
आज फिर ढूंढ रही है वही मंज़र आंखें
फूट निकली तो कई शहर-ए-तमन्ना डूबे
एक क़तरे को तरसती हुई बंजर आंखें
उस को देखा है तो अब शौक़ का वो आलम है
अपने हलकों से निकल आई हैं बाहर आंखें
तू निगाहों की जुबां खूब समझता होगा
तेरी जानिब तो उठा करती हैं अक्सर आंखें
लोग मरते ना दर-ओ-बाम से टकरा के कभी
देख लेते जो 'कमाल' उस की समंदर आंखें
अहमद कमाल.
दर्द मिन्नत-कशे-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ
जमा करते हो कयों रकीबों को ?
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ
हम कहां किस्मत आज़माने जाएं
तू ही जब ख़ंजर-आज़मा न हुआ
कितने शरीं हैं तेरे लब कि रकीब
गालियां खा के बे मज़ा न हुआ
है ख़बर गरम उनके आने की
आज ही घर में बोरीया न हुआ
क्या वो नमरूद की ख़ुदायी थी
बन्दगी में मेरा भला न हुआ
जान दी, दी हुयी उसी की थी
हक तो यह है कि हक अदा न हुआ
ज़ख़्म गर दब गया, लहू न थमा
काम गर रुक गया रवां न हुआ
रहज़नी है कि दिल-सितानी है
ले के दिल, दिलसितां रवाना हुआ
कुछ तो पढ़ीये कि लोग कहते हैं
आज 'ग़ालिब' ग़ज़लसरा न हुआ !!!
क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में.
दिल लगाकर उम्र भर जागा किए हम लोग जितने
नींद जिस दिन आई, अपने वास्ते बिस्तर नहीं था !
ध्रुव गुप्त

Wednesday, 19 November 2014

कंकर समेट लाए बहुत..

वहाँ की रोशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत
मैं उस गली में अकेला था और साए बहुत..

किसी के सर पे कभी टूटकर गिरा ही नहीं
इस आसमाँ ने हवा में क़दम जमाए बहुत..

हवा की रुख़ ही अचानक बदल गया वरना
महक के काफ़िले सहरा की सिम्त आए बहुत..

ये क़ायनात है मेरी ही ख़ाक का ज़र्रा
मैं अपने दश्त से गुज़रा तो भेद पाए बहुत..

जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया
तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत..

बस एक रात ठहरना है क्या गिला कीजे
मुसाफ़िरों को ग़नीमत है ये सराय बहुत..

'शकेब' कैसी उड़ान अब वो पर ही टूट गए
कि ज़ेरे-दाम जब आए थे फड़फड़ाए बहुत.

~~शकेब जलाली

Friday, 14 November 2014

लौट आया!

वो चाहता था कि कासा खरीद ले मेरा;
मैं उसके ताज की कीमत लगा के लौट आया!

गजब करते हैं

काम सब गेरज़रुरी हैं, जो सब करते हैं
और हम कुछ नहीं करते हैं, गजब करते हैं

आप की नज़रों मैं, सूरज की हैं जितनी अजमत
हम चरागों का भी, उतना ही अदब करते हैं..................राहत इन्दौरी

मुघालता है कोई

गुलजार

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नजर में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।

चल के देखते हैं

यह कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं

अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं

Monday, 10 November 2014

नसीब में जिनके

मेरी ख़ुशी के लम्हे इस कदर मुख्तसिर* हैं फ़राज़
गुज़र जाते हैं मेरे मुस्कराने से पहले
* मुख्तसिर = छोटे

Sunday, 2 November 2014

कोई बदलाव की सूरत नहीं थी
बुतों के पास भी फुर्सत नहीं थी ......
अब उनका हक़ है सारे आसमां पर
कभी जिनके सरों पर छत नहीं थी .............
वफ़ा ,चाहत, मुरव्वत सब थे मुझमे
बस इतनी बात थी दौलत नहीं थी ........
फ़क़त प्याले थे जितने क़ीमती थे
शराबों की कोई क़ीमत नहीं थी ..............
मैं अब तक खुद से ही बेशक़ ख़फ़ा हूँ
मुझे तुमसे कभी नफरत नहीं थी .......
गए हैं पार हम भी आसमां के
वंहा लेकिन कोई जन्नत नहीं थी .........
वंहा झुकना पड़ा फिर आसमां को
ज़मीं को उठने की आदत नहीं थी .............
घरों में जीनतें बिखरी पड़ी हैं
मकानों में कोई औरत नहीं थी ...........
सचिन अग्रवाल
डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा.....!!!

तमाशा रहा हूँ मैं

देखा गया हूँ मैं कभी सोचा गया हूँ मैं
अपनी नज़र में आप तमाशा रहा हूँ मैं

मुझसे मुझे निकाल के पत्थर बना दिया
जब मैं नहीं रहा हूँ तो पूजा गया हूँ मैं

मैं मौसमों के जाल में जकड़ा हुआ दरख़्त
उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं

ऊपर के चेहरे-मोहरे से धोखा न खाइए
मेरी तलाश कीजिए, गुम हो गया हूँ मैं

निदा फ़ाज़ली

किसी से क्या लेगा;

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा;
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा;

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा;
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा;

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा;
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा;

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए;
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा;

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे;
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा;

हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता 'वसीम';
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा।

»»» वसीम बरेलवी !!!

नज़र न आए मुझे

यह मोजज़ा[1] भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे
कि संग तुझ पे गिरे और ज़ख़्म आए मुझे

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही दोपहर न भाए मुझे

ब-रंग-ए-ऊद [2] मिलेगी उसे मेरी ख़ुश्बू
वो जब भी चाहे बड़े शौक़ से जलाए मुझे

मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ
बरह्ना [3] शहर में कोई नज़र न आए मुझे

वही तो सब से ज़्यादा है नुक्ताचीं मेरा
जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाए मुझे

मैं अपने दिल से निकालूँ ख़्याल किस-किस का
जो तू नहीं तो कोई और याद आए मुझे

ज़माना दर्द के सहरा तक आज ले आया
गुज़ार कर तेरी ज़ुल्फ़ों के साए -साए मुझे

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे

वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यों नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे

मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ ‘क़तील’
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाए मुझे

शब्दार्थ:
1.↑ प्रतिबन्ध
2.↑ अगरबती की तरह
3.↑ नंगा, ख़ाली

"क़तील शिफ़ाई"

क्या भरोसा है

सफ़र को जब भी किसी
दास्तान में रखना
क़दम यकीन में, मंज़िल
गुमान में रखना |
जो सात है वही घर का
नसीब है लेकिन
जो खो गया उसे भी
मकान में रखना |
जो देखती हैं निगाहें
वही नहीं सब कुछ
ये एहतियात भी अपने
बयान में रखना |
वो ख्वाब जो चेहरा
कभी नहीं बनता
बना के चाँद उसे
आसमान में रखना |
चमकते चाँद-सितारों का
क्या भरोसा है
ज़मीं की धुल भी अपनी
उड़ान में रखना |
सवाल तो बिना मेहनत के
हल नहीं होते
नसीब को भी मगर
इम्तहान में रखना |

nida fazali

गुलिस्तां बना दिया....

यूं मुस्कराये जान सी कलियों में पड़ गई..
यूं लब कुशा हुए कि गुलिस्तां बना दिया....

........असगर गोंडवी.........

दुनिया के सितम

दुनिया के सितम याद,न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीँ कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद

क्या लुत्फ़ कि मैँ अपना पता बताऊं
कीजे भूली हुई ख़ास अपनी अदा याद

मुद्दत हुई इक हादिसा-ए-इश्क़ को लेकिन
अब तक है तेरे दिल के धडकने की सदा याद ...॥

- 'जिगर' मुरादाबादी ॥

कुछ कम है

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है
हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक ये ज़मीं कुछ कम है

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है

अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
ये अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है

shaharyar

ज़िंदगी के लिए

हर एहतिमाम है दो दिन की ज़िंदगी के लिए
सुकून-ए-क़ल्ब नहीं फिर भी आदमी के लिए

तमाम उम्र ख़ुशी की तलाश में गुज़री
तमाम उम्र तरसते रहे ख़ुशी के लिए

न खा फ़रेब वफ़ा का ये बे-वफ़ा दुनिया
कभी किसी के लिए है कभी किसी के लिए

ये दौर-ए-शम्स-ओ-क़मर ये फ़रोग़-ए-इल्म-ओ-हुनर
ज़मीन फिर भी तरसती है रौशनी के लिए

कभी उठे थे जो खुर्शीद-ए-ज़िंदगी बन कर
तरस रहे हैं वो तारों की रौशनी के लिए

सितम-तराज़ी-ए-दौर-ए-ख़िरद ख़ुदा की पनाह
के आदमी ही मुसीबत है आदमी के लिए

रह-ए-हयात की तारीकियों में ऐ 'ज़ाहिद'
चराग़-ए-दिल है मेरे पास रौशनी के लिए

"अबुल मुजाहिद 'ज़ाहिद'"

उलझी हुई सी

***************************************************
इन आंखों के तिलिस्मों को कहीं तू और ले जा, दोस्त,
यहाँ पर ज़िंदगी पहले ही कुछ उलझी हुई सी है।
***************************************************
<>श्रवण<>
निगाहो को जरा झुका लीजिए जनाब ,
मेरे मजहब में नशा हराम है ....!!

मुनासिब अब नहीं

बेअदब मौसम से डरना है मुनासिब अब नहीं
मोम की मानिंद गलना है मुनासिब अब नहीं

हम से बढ़कर . इस जहाँ में . दूसरा कोई नहीं
इस कदर हर बार कहना है मुनासिब अब नहीं

है बुरा यह वक्त . लेकिन. इक खुशी के. वास्ते
ताक पर . ईमान रखना है. मुनासिब अब नहीं

टूटना तय . एक दिन है. साज़िशों का. हर मकां
इस तरह का ख्वाब ढहना है मुनासिब अब नहीं

--------------अशोक आलोक

ज़रा आसमान रहने दो

ज़रा शिक़स्तगी, थोड़ी उड़ान रहने दो
बहुत ज़मीन, ज़रा आसमान रहने दो

बुलंदियों के लिए सीढियां हज़ार रहें
मगर ज़मीन तलक़ एक ढलान रहने दो

कहां वो ज़िस्म, कहां आग रही है बाकी
चंद किस्से हैं मगर दरमियान रहने दो

हमारे दुश्मनों तुमसे दुआ सलाम रहे
तेरे शहर में हमारा मकान रहने दो

मेरी शिक़स्त के पीछे वज़ह तुम्ही होगे
यक़ीन मत दो मगर यह गुमान रहने दो

मिटा दो दाग मेरे सीने से बेशक़ कोई
पुराने ज़ख्म के एक दो निशान रहने दो

तेरी पनाह में आकर हमें न होश रहे
हमारे ज़िस्म में इतनी थकान रहने दो

ज़रा ज़रा कभी बेचैन भी करो हमको
ज़रा ज़रा सा मगर इत्मीनान रहने दो

ध्रुव गुप्त

ये नहीं ..कोई और ...

अभी बहुत कच्चा हूँ ..अफ़सोस जीवन एक ही है जो अधूरा रहेगा बहुत सारे एहसास से ..जो है घिसा-पिटा एक जैसा बेहद उबाऊ ..और जिसे याद रख सकूँ ..वो छूटता गया ..जिसे चाहता हूँ वहां पहुंचकर लगता है ये नहीं ..कोई और ...असंतोष नहीं है ये ..अतृप्ति भी नहीं ...एक अलग तरह की कमी है ..जिसे कभी-कभी महसूस किया जा सकता है |

इक तेरी दीद

हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाक़ी
ज़ब्त का हौसला नहीं बाक़ी

इक तेरी दीद छिन गई मुझ से
वर्ना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी

अपनी मश्क़-ए-सितम से हाथ न खेंच
मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी

तेरी चश्म-ए-अलमनवाज़ की ख़ैर
दिल में कोई गिला नहीं बाक़ी

हो चुका ख़त्म अहद-ए-हिज्र-ओ-विसाल
ज़िन्दगी में मज़ा नहीं बाक़ी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़.....

रोना . नहीं है

बहुत मासूमियत ढोना . नहीं है
बुरा है वक्त .पर रोना . नहीं है

ज़मीं से आसमां तक है . अँधेरा
उजाले का सफर खोना .नहीं है

दुखों के हैं बहुत घर. ज़िन्दगी में
खुशी का एक भी .कोना नहीं. है

सफाई से . सफाई. कीजिए. क्या
जिगर का दाग जब धोना नहीं है

कई आँखों में कितने ख्वाब हैं पर
उसे सच भी . कभी होना . नहीं है

---------------------------------------अशोक आलोक

मेरे नासेहा मुझे ये बता

यहाँ काँप जाते हैं फ़लसफ़े ये बड़ा अजीब मक़ाम है
जिसे अपना अपना ख़ुदा कहें उसे सज्दा करना हराम है

मेरी बे-रूख़ी से न हो ख़फ़ा मेरे नासेहा मुझे ये बता
जो नज़र से पीता हूँ मैं यहाँ वो शराब कैसे हराम है

जो पतिंगा लौ पे फ़िदा हुआ तो तड़प के शमा ने ये कहा
इसे मेरे दर्द से क्या ग़रज़ ये तो रौशनी का ग़ुलाम है

शब-ए-इंतिज़ार में बारहा मुझे ‘अनवर’ ऐसा गुमाँ हुआ
जिसे मौत कहता है ये जहाँ वो किसी के वादे का नाम है

(अनवर मिर्जापुरी)
हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के खिलाफ...
हम चुनेंगे साथी जिंदगी के टुकड़े..

मिटा के गई है

ख़ुशी क़र्ज़ अपना चुका के गई है
पता वो गमों को बता के गई है
नहीं ख्वाब दिखते मुझे हसरतों के
ज़खीरे खुशी के जला के गई है
नहीं थी गुलों की महक ऐ नसीबां
खिज़ा जो चमन को मिटा के गई है
मज़ार पर आके किसी रोज़ मेरी
कब्र पे दिया वो जला के गई है
हवा तू बता दे खता-ए-दरख्तों
पुराने शज़र क्यूं गिरा के गई है


पूनम 'चाँद'

"Good news कब दे रहे हो बेटा ?? "

15 की उम्र में मेट्रिक में 95% फिर 17 में science या commerce से +2 की पढाई कर के उसमे भी कुछ 90% जैसा ले आना | 20 से 21 साल की उम्र में या तो इंजिनियर हो जाओ या फिर CA / CS और हाँ फिर एक साल नौकरी कर के कहीं बड़ी जगह से MBA करने चले जाना | 26 -27 तक education loan चुकाने में जुटे रहना फिर और 28 में तो एक सुन्दर सुशील घरेलु कामकाजी व्यवहार कुशल खानदानी (लिस्ट लम्बी है) लड़की देख कर हाथ भी पीले करने हैं तुम्हारे | और शादी हुई नहीं की "Good news कब दे रहे हो बेटा ?? " वाले सवाल शुरू होंगे !! फिर 29 में पहला बच्चा और अगर कहीं पहली लड़की हुई तो 31 में दूसरा !!
बाकि की जिन्दगी आराम से बच्चे पालने में काटना | ऐसे ही चलता है भाई !! हमारे पुरखे ऐसा ही करते आये हैं !! तुम्हारे दूध के दांत टूटे नहीं आये हो हमें सिखाने ? गधे हैं सारे लोग जो ऐसा ही करते आये हैं ? पुरातन काल से यही व्यवस्था चलती आई है ! अरे मिल लेना पहले लड़की से कोई जबरदस्ती थोड़ी न बाँध रहे तुम्हारे गले ? समाज को हमें भी जवाब देना होता है.. दस लोग जो पूछने आते हैं आख़िर क्या बतायें उन्हें ?
बड़ी ही अच्छी व्यवस्था है भाई | जड़ और चेतन का फर्क है | जैसे किसी पत्थर को सुबह कहीं रख दीजिये, शाम में आइये वहीँ पड़ा मिलेगा | जड़ है, अपनी मर्ज़ी से थोड़ी हिलेगा | और चेतन ? भाई बकरी को खड़ा कर दो कहीं, मजाल है जो शाम में वहीं मिल जाए | क्या है की मन शरीर से चंचल होता है | अगर टिकने वाले विवाह चाहिए तो शरीर का करवाइए, मन थोड़े ऊँचे level की चीज़ है |
प्रेम होगा तो मन से होगा, शरीर से होगा नहीं, और ऐसे में जब शादी होगी तो वहां मौजूद सब लोगों को महसूस होगी | शादी उर्दू शब्द है "शाद" से बनता है और मतलब है ख़ुशी, जाइये किसी "Love Marriage" में जरा, न महसूस हो जाए ख़ुशी तो आ के बताइयेगा |
25 से 30 या 35 तक की उम्र से बेहतर समय मिलेगा नहीं दोबारा | पैसे भी होंगे इस वक़्त, ढेर सी जिम्मेदारियों का रोना नहीं होगा तो समय भी होगा, और उम्र साथ होगी इसलिए energy भी.. घूमो, दुनिया देखो, हो जाए प्यार तो होने दो.. छूटे साथ तो फिर नयी दुनियाँ तलाशो..
हुक्म सबका सुन चुके .. कभी अपनी भी सुन लो..

Anand Kumar

सोचने का एक मुद्दा

अपनी पसंद से अपने लायक रोज़गार नहीं चुनेगा आदमी तो हर रोज़ तो काम पे जाते वक़्त किसी न किसी को कोस रहा होगा !! ऐसी बेकार सी life किसी के सर थोपने का क्या फ़ायदा ? सोचने का एक मुद्दा तो ये भी है !!

Anand Kumar

कम आते है

मैनेँ दो चार किताबेँ तो पढी है,लेकिन
शहर के तौर तरीके मुझे कम आते है

खूबसूरत सा कोई हादसा आंखों मेँ लिये
घर की दहलीज़ पर डरे हुए हम आते है ॥

- बशीर बद् ।

कुछ दिनों से

अजीब रंग का मौसम चला है कुछ दिनों से
नज़र पर बोझ है और दिल खफ़ा है कुछ दिनों से

वो और था जिसे तू जनता था बरसों से
मैं और हूँ जिसे तू मिल रहा है कुछ दिनों से

अदा है,शोखी है,जादू है या फरेब कोई
न जाने उस की निगाह में क्या है कुछ दिनों से !!!

»»» बशीर बद्र !!!

ज़िन्दगी तुम हो

ऐसा लगता ज़िन्दगी तुम हो
अजनबी कैसे अजनबी तुम हो।

अब कोई आरज़ू नहीं बाकी
जुस्तजू मेरी आख़िरी तुम हो।

मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँ
आसमानों की चाँदनी तुम हो।

दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें
किस ज़माने के आदमी तुम हो।

»»» बशीर बद्र !!!

कुबूल हैं

कभी धूप दे, कभी बदलियां, दिलोजान से दोनों कुबूल हैं,
मगर उस नगर में ना कैद कर, जहां जिन्दगी की हवा ना हो।
☆☆बशीर

डूब जाता है कभी

कभी साया है कभी धुप मुकद्दर मेरा
होता रहता है यूँ ही क़र्ज़ बराबर मेरा

टूट जाते हैं कभी मेरे किनारे मुझमे
डूब जाता है कभी मुझमे समंदर मेरा

किसी सेहरा में बिछड़ जायेंगे सब यार मेरे
किसी जंगल में भटक जायेगा लश्कर मेरा

बा वफ़ा था तो मुझे पूछने वाले भी न थे
बे वफ़ा हूँ तो हुआ नाम भी घर घर मेरा

कितने हँसते हुए मासूम अभी आते लेकिन
एक ही धुप से कुम्भला गया मंज़र मेरा

अथर नफीस

फ़ना होने से डरता हैं

यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता हैं
खिलौना है जो मिटटी का फ़ना होने से डरता हैं

मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है

बहुत मुश्किल नहीं है आईने के सामने जाना
हमारा दिल मगर क्यों सामना होने से डरता है

न बस में ज़िन्दगी इसके न काबू मौत पैर इसका
मगर इंसान फिर भी कब खुद होने से डरता है

अज़ब ये ज़िन्दगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसान
रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है

rajesh reddy

एक ज़माने से

उसे बचाए कोई कैसे टूट जाने से
वो दिल जो बाज़ न आये फरेब खाने से

वो शख्स एक ही लम्हे में टूट-फुट गया
जिसे तराश रहा था में एक ज़माने से

रुकी रुकी से नज़र आ रही है नब्ज़-इ-हयात
ये कौन उठ के गया है मेंरे सिरहाने से

न जाने कितने चरागों को मिल गयी शोहरत
एक आफ़ताब के बे-वक़्त डूब जाने से

उदास छोड़ गया वो हर एक मौसम को
गुलाब खिलते थे जिसके यूँ मुस्कुराने से

- इकबाल अशर

सितम क्या है

बहुत मिला न मिला ज़िंदगी से ग़म क्या है
मता-ए-दर्द बहम है तो बेश-ओ-कम क्या है

हम एक उम्र से वाक़िफ़ हैं अब न समझाओ
के लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबाँ सितम क्या है

करे न जग में अलाव तो शे'र किस मक़सद
करे न शहर में जल-थल तो चश्म-ए-नम क्या है

अजल के हाथ कोई आ रहा है परवाना
न जाने आज की फ़ेहरिस्त में रक़म क्या है

लिहाज़ में कोई कुछ दूर साथ चलता है
वरना दहर में अब ख़िज़्र का भरम क्या है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वक्त न था

दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था|
तुम्हारे घर का सफ़र इस क़दर सख्त न था।

इतने मसरूफ़ थे हम जाने के तैयारी में,
खड़े थे तुम और तुम्हें देखने का वक्त न था।

मैं जिस की खोज में ख़ुद खो गया था मेले में,
कहीं वो मेरा ही एहसास तो कमबख्त न था।

जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया न ख़ौल उठा,
वो और कुछ हो मगर आदमी का रक्त न था।

उन्हीं फ़क़ीरों ने इतिहास बनाया है यहाँ,
जिन पे इतिहास को लिखने के लिए वक्त न था।

शराब कर के पिया उस ने ज़हर जीवन भर,
हमारे शहर में 'नीरज' सा कोई मस्त न था।

~~गोपालदास 'नीरज'

कहीं फिर सँभल न जाए

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए
न झुकाओ तुम निग़ाहें कहीं रात ढल न जाए।

मेरे अश्क भी हैं इसमें ये शराब उबल न जाए
मेरा जाम छूने वाले तेरा हाथ जल न जाए।

मेरी ज़िन्दग़ी के मालिक मेरे दिल पे हाथ रखना
तेरे आने की खुशी में मेरा दन निकल न जाए।

अभी रात कुछ है बाकी न उठा नक़ाब साकी
तेरा रिन्द गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए।

इसी ख़ौफ़ से नशेमन न बना सका मैं ‘अनवर’
कि निग़ाह-ए-अहल-ए-गुलशन कहीं फिर बदल न जाए।.....anwar mirzapuri

अंदर की टूट -फूट

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया

आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी
सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया

फिर भी न दूर हो सकी आँखों से बेवगी
मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया

दुनिया क्या ख़बर इसे कहते हैं शायरी
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया

अंदर की टूट -फूट छिपाने के वास्ते
जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया

घर की ज़रूरतों के लिए अपनी उम्र को
बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया

पिछला निशान जलने का मौजूद था तो फिर
क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया

मुनव्वर राना

जान तो गया

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूठी क़सम से आप का ईमान तो गया

दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उल्टी शिकायतें रही एहसान तो गया

अफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो जिल्लतें हुईं
लेकिन उसे जता तो दिया, जान तो गया

देखा है बुतकदे में जो ऐ शेख कुछ न पूछ
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया

डरता हूँ देख कर दिल-ए-बेआरज़ू को मैं
सुनसान घर ये क्यूँ न हो मेहमान तो गया

क्या आई राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में
वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया

गो नामाबर से कुछ न हुआ पर हज़ार शुक्र
मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

बज़्म-ए-उदू में सूरत-ए-परवाना मेरा दिल
गो रश्क़ से जला तेरे क़ुर्बान तो गया

होश-ओ-हवास-ओ-ताब-ओ-तवाँ 'दाग़' जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया ........daag dehelvi

देर से

कहीं छत थी, दीवारो-दर थे कहीं
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे
मगर जो दिया वो दिया देर से

हुआ न कोई काम मामूल से
गुजारे शबों-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से

कभी रुक गये राह में बेसबब
कभी वक़्त से पहले घिर आयी शब
हुए बन्द दरवाज़े खुल-खुल के सब
जहाँ भी गया मैं गया देर से

ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है
यही है जुदाई, यही मेल है
मैं मुड़-मुड़ के देखा किया दूर तक
बनी वो ख़मोशी, सदा देर से

सजा दिन भी रौशन हुई रात भी
भरे जाम लगराई बरसात भी
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी
जो होना था जल्दी हुआ देर से

भटकती रही यूँ ही हर बन्दगी
मिली न कहीं से कोई रौशनी
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी
हुआ मुझमें रौशन ख़ुदा देर से

निदा फ़ाज़ली

सीने से लगाये बैठे हैं

ईश्क के घर में चराग़े दिल जलाये बैठे हैं
तब से हम आग के दरिया में नहाये बैठे हैं

ज़माने की झूठी तसल्ली हमें गवारा नहीं
अपने ज़ख्म अपने सीने से लगाये बैठे हैं

जाने किस पल बुत में दिल धड़क जाए
यही सोच के पत्थर से दिल लगाये बैठे हैं

गुलबदन है छिल न जाए उसका जिस्म
महबूब के लिए हम चाँदनी बिछाए बैठे हैं

सुना है अकेले में मेरी ग़ज़ल गुनगुनाते हैं
आज उसी के लिए महफ़िल सजाये बैठे हैं

मुकेश इलाहाबादी 
मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रखकर चल दिया
कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे
----" Bashir Badr "
मुझे पतझडो की कहानियों ना सुना सुना कर उदास कर
तू खिजा का फूल है मुसकरा जो गुजर गया सो गुजर गया
वो उदास धूप समेट कर कही वादियो मे उतर चुका
उसे अब ना दे मेरे दिल सदा जो गुजर गया सो गुजर गया
बशीर बद्र

न हो

कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी का हवा न हो

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से
जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे
मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो !!!


बशीर बद्र

अब तेरे मेरे बीच

अब तेरे मेरे बीच कोई फासला भी हो,
हम लोग जब मिलें तो कोई दूसरा भी हो

तू जानता नहीं मेरी चाहत अजीब है,
मुझ को मना रहा है कभी खुद खफा भी हो

तू बेवफा नहीं है मगर बेवफाई कर,
उसकी नज़र में रहने का कुछ सिलसिला भी हो

पतझड़ के टूटते हुए पत्तों के साथ साथ,
मौसम कभी तो बदलेगा ये आसरा भी हो

चुपचाप उसको बैठ के देखूं तमाम रात,
जागा हुआ भी हो कोई सोया हुआ भी हो

उसके लिए तो मैंने यहाँ तक दुआएं की,
मेरी तरह से कोई उसे चाहता भी हो. !!

Bashir Badr
अगर आदाब कर लेते तो मसनद मिल गई होती,
अगर लहजा बदल लेते गवर्नर हो गए होते !


Agar Aadaab kar Letey tou Masnad mil gayi hoti,
Agar Lehja Badal Lete Governor ho gaye hotey !

"अब जिसके जी में आए वही पाए रोशनी 'कतील',
हमने तो दिल जला के...... सर-ए-आम रख दिया."
ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन सा दयार है,
हद्द-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है..........
............. शहरयार
Kuch aur bhee hain kaam humein
gham - e - janaana
Kab tak koi uljhee huey zulfon kou sanwaaray....
Habib Jalil

बहाने नहीं सफलता के रास्ते खोजिए. . . . .

बहाने नहीं सफलता के रास्ते खोजिए. . . . .
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1.मुझे उचित शिक्षा लेने का अवसर नही मिला|
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उचित शिक्षा का अवसर फोर्ड मोटर्स के मालिक हेनरी फोर्ड को भी नही मिला।
2.मै अत्यंत गरीब घर से हूँ|
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पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी गरीब घर से थे।

3.बचपन मे ही मेरे पिता का देहाँत हो गया था|
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प्रख्यात संगीतकार ए.आर.रहमान के पिता का भी देहांत बचपन मे हो गया था।
4.मै बचपन से ही अस्वस्थ था|
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आँस्कर विजेता अभिनेत्री मरली मेटलिन भी बचपन से बहरी व अस्वस्थ थी।
5.मैने साइकिल पर घूमकर आधी ज़िंदगी गुजारी है|
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निरमा के करसन भाई पटेल ने भी साइकिल पर निरमा बेचकर आधी ज़िंदगी गुजारी।
6.एक दुर्घटना मे अपाहिज होने के बाद मेरी हिम्मत चली गयी|
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प्रख्यात नृत्यांगना सुधा चन्द्रन के पैर नकली है।
7.मुझे बचपन से मंद बुद्धि कहा जाता है|
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थामस अल्वा एडीसन को भी बचपन से मंदबुद्धि कहा जाता था।
8.मै इतनी बार हार चूका,अब हिम्मत नही|
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अब्राहम लिंकन 15 बार चुनाव हारने के बाद राष्ट्रपति बने थे।
9.मुझे बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी|
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लता मंगेशकर को भी बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी थी।
10.मेरी लंबाई बहुत कम है|
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सचिन तेंदुलकर की भी लंबाई कम है।
11.मै एक छोटी सी नौकरी करता हूँ,इससे क्या होगा|
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धीरु भाई अंबानी भी छोटी नौकरी करते थे।
12.मेरी कम्पनी एक बार दिवालिया हो चुकी है,अब मुझ पर कौन भरोसा करेगा|
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दुनिया की सबसे बङी शीतल पेय निर्माता कम्पनी भी दो बार दिवालिया हो चुकी है।
13.मेरा दो बार नर्वस ब्रेकडाउन हो चुका है,अब क्या कर पाउँगा?
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डिज्नीलैंड बनाने के पहले वाल्ट डिज्नी का तीन बार नर्वस ब्रेकडाउन हुआ था।
14.मेरी उम्र बहुत ज्यादा है|
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विश्व प्रसिद्ध केंटुकी फ्राइड चिकेन के मालिक ने 60 साल की उम्र मे पहला रेस्तरा खोला था।
15.मेरे पास बहुमूल्य आइडिया है पर लोग अस्वीकार कर देते है|
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जेराँक्स फोटो कापी मशीन के आईडिया को भी ढेरो कंपनियो ने अस्वीकार किया था पर आज परिणाम सामने है।
16.मेरे पास धन नही है|
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इन्फोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायणमूर्ति के पास भी धन नही था|उन्हे अपनी पत्नी के गहने बेचने पड़े थे।
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आप कहेगे कि यह जरुरी नही कि जो प्रतिभा इन महानायको मे थी,वह मुझ में भी हो|
मै इस बात से सहमत हूँ|
लेकिन,यह भी जरुरी नही कि जो प्रतिभा आपके अंदर है वह इन महानायको में भी हो!
कोशिश तो कीजिये|हो सकता है की आप उनसे भी आगे निकल जाये|
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मतलब यह है कि.....
यदि आप आगे बढ़ना चाहते है तो आपको दो में एक को चुनना होगा…..
बहाना या सफलता का रास्ता!
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आप साहसी है|
अपनी मेहनत,हिम्मत और ईमानदारी के दम पर अपनी किस्मत को बदलने का प्रयास कीजिये|सफलता का रास्ता खोजना पड़ता है|वह अपने आप नहीं मिल जाता है|उसे खोजिए और उसपर चलना शुरू कर दीजिये|एक न एक दिन मंजिल जरूर मिलेगी|
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खुद भी जगिये और दुसरो को भी जगाइए|लिख डालिये सफलता की एक नई कहानी ताकि दूसरे लोग भी आपसे प्रभावित होकर बहानेबाजी छोड़े और खोज निकालें अपनी सफलता का रास्ता!
~ मुश्किलें ज़िन्दगी की दर्स हैं घबराना कैसा इनसे ,,
ये ऐसी राह हैं , मौत को भी ज़िन्दगी दे जाये ...........
ज़ख्म ताज़ा हो तो ,ज़ख्मों के मरहम भी लगा दो ,,
मुमकिन है कोई ज़ख्म , ज़ख्मों को शिफ़ा दे जाए ............
गर अपनी ख्वाहिशें कम कर, दुनिया के मुसाफिर,,
तड़पती रूहों को भी , उनके कफ़न मिल जाएं ....................
अदब से चल के दिखा , ज़िन्दगी की राहों पर ,
भटकते भीड़ में राही को , अपना पता मिल जाये .........
नेकियाँ भूल , गुनाहों से शर्मशार हो दिल ,
मुमकिन है अस्तग़फ़ार से, हर लम्हा खुदा मिल जाये ...........
*** दर्स =Lesson , मरहम =Ointment , ज़ख्म = Wounding, शिफ़ा = Relax,अदब =Respect , गुनाह =Sin,मुमकिन = possibilities, अस्तग़फ़ार = Acceptance of Sins , लम्हा = Seconds / Nano Seconds
~ Nida aftab ~

तुम्हारे सामने

हश्र के दिन भी हो शरह-ए-ग़म1 तुम्हारे सामने
सब ख़ुदा के सामने हों, हम तुम्हारे सामने
रू-ब-रू मेरे बिठाया जिस तरह से ग़ैर को
हो यूं ही एक फ़ित्‍ना-ए-आलम2 तुम्हारे सामने
बाद मेरे रोएगा सारा ज़माना देखना
धूम से होगा मेरा मातम तुम्हारे सामने
क़त्ल कर डालो हमें या जुर्म-ए-उल्फ़त3 बख़्श दो
लो! खड़े हैं हाथ बांधे हम तुम्हारे सामने
एक तुम्हारी चुप में सौ एजाज़4 देखे ऐ बुतो
चुप खड़े हैं ईसा-ओ-मरयम तुम्हारे सामने
हाल-ए-दिल में कुछ न हो तासीर, ये मुमकिन नहीं
कोई इतना हो कहे हर दम तुम्हारे सामने
आह लब पर आए थम थम कर कि तुम घबरा न जाओ
दर्द दिल में हो मगर कम से कम तुम्हारे सामने
अब ये बेबाकी, वो दिन भी याद हैं जब छुप गए
आ गया जब कोई नामहरम5 तुम्हारे सामने
-----दाग़ देहलवी
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1.ग़म की व्याख्या 2.संसार 3.प्रेम का अपराध 4.चमत्कार 5.अपरिचित

अच्छा है

ग़ैर के नाम से पैग़ाम-ए-विसाल(1) अच्छा है
छेड़ का जिसमें मज़ा हो वो सवाल अच्छा है
सुल्‍ह दुश्मन से भी कर लेंगे तेरी ख़ातिर से
जिस तरह से हो ग़रज़ रफ़्‍अ-ए-मलाल(2) अच्छा है
लोग कहते हैं भलाई का ज़माना न रहा
ये भी कह दें कि बुराई का मआल(3) अच्छा है
देखने वालों की हालत नहीं देखी जाती
जो न देखे वही मुश्ताक़-ए-जमाल(4) अच्छा है
एक दुकां में अभी रख आए हैं हम अपना दिल
दूर से सब को बताते हैं वो माल अच्छा है
ऐसे बीमार की, अफ़सोस, दवा हो क्योंकर
अभी दम भर में बुरा है, अभी हाल अच्छा है
हम से पूछे कोई दुनिया में है क्या शै(5) अच्छी
रंज अच्छा है, ग़म अच्छा है, मलाल अच्छा है
दिल तो हम देंगे मगर पेश्तर(6) इतना कह दो
हिज्र अच्छा है तुम्हारा कि विसाल अच्छा है?
बाग़-ए-आलम(7) में कोई ख़ाक फले फूलेगा
बर्क़8 गिरती है उसी पर जो निहाल(9) अच्छा है
आप पछताएं नहीं, जौर(10) से तौबा न करें
आप घबराएं नहीं ‘दाग़’ का हाल अच्छा है
---दाग़ देहलवी
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1.मिलन संदेश 2.कष्‍टों का अंत 3.परिणाम 4.सौन्दर्याभिलाषी 5.वस्तु 6.पहले 7.संसार का उपवन 8.बिजली 9.पौधा 10.अत्याचार
उदासियों में भी मुस्करा रहा था मैं !
फ़क़ीरी के भी लुफ़्त उठा रहा था मैं !!
झूठीं हँसी का राज़ जानता था मगर !
बड़े ही अदब से फ़रेब खा रहा था मैं !!
 " तन्हा " !!

एक बौछार था वो...

जगजीत: एक बौछार था वो... / गुलज़ार
एक बौछार था वो शख्स,
बिना बरसे किसी अब्र की सहमी सी नमी से
जो भिगो देता था...
एक बोछार ही था वो,
जो कभी धूप की अफशां भर के
दूर तक, सुनते हुए चेहरों पे छिड़क देता था
नीम तारीक से हॉल में आंखें चमक उठती थीं

सर हिलाता था कभी झूम के टहनी की तरह,
लगता था झोंका हवा का था कोई छेड़ गया है
गुनगुनाता था तो खुलते हुए बादल की तरह
मुस्कराहट में कई तरबों की झनकार छुपी थी
गली क़ासिम से चली एक ग़ज़ल की झनकार था वो
एक आवाज़ की बौछार था वो!!